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साउथ अफ्रीका में रामफोसा दूसरी बार बने राष्ट्रपति: देश में 30 साल बाद गठबंधन की सरकार, मंडेला की पार्टी को विपक्षी दल ने दिया समर्थन

केपटाउन3 दिन पहले

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राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा की पार्टी ANC पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप हैं। - Dainik Bhaskar

राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा की पार्टी ANC पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप हैं।

साउथ अफ्रीका में सिरिल रामफोसा लगातार दूसरी बार देश के राष्ट्रपति बन गए हैं। BBC न्यूज के मुताबिक, रामफोसा की अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस पार्टी (ANC) ने सरकार बनाने के लिए सबसे बड़े विपक्षी दल डेमोक्रेटिक अलायंस (DA) के साथ गठबंधन किया है। इसी के साथ गठबंधन सरकार के पास अब संसद में 400 में से 283 सीटें हैं।

इसी के साथ पिछले 30 साल में यह पहली बार है जब नेल्सन मंडेला की बनाई ANC पार्टी ने देश में गठबंधन की सरकार बनाई है। दरअसल, साउथ अफ्रीका में 29 मई को आम चुनाव हुए थे। इसमें नेल्सन मंडेला की पार्टी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को सबसे अधिक 40% वोट हासिल हुए, लेकिन वह बहुमत से चूक गई। वहीं ANC की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टी DA को 22% वोट मिले।

तस्वीर में ANC लीडर सिरिल रामफोसा गठबंधन के सदस्य DA पार्टी के लीडर जॉन स्टीनहाइसन से हाथ मिलाते हुए।

तस्वीर में ANC लीडर सिरिल रामफोसा गठबंधन के सदस्य DA पार्टी के लीडर जॉन स्टीनहाइसन से हाथ मिलाते हुए।

राष्ट्रपति बोले- देश में नए युग की शुरुआत
गठबंधन की घोषणा के बाद राष्ट्रपति रामफोसा ने कहा, “दूसरी बार देश की सेवा का मौका मिलना मेरे लिए सम्मान की बात है। एक-दूसरे का विरोध करने वाले दलों ने आज साथ आकर सरकार का गठन किया है। यह साउथ अफ्रीका में एक नए युग की शुरुआत है।”

चुनाव में बहुमत न मिलने के बाद पिछले 2 हफ्तों से ANC गठबंधन की कोशिश में जुटी हुई थी। इसके बाद शुक्रवार को देश के 2 सबसे बड़े दलों ने साथ आकर सरकार बनाने की घोषणा की। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 30 साल से साउथ अफ्रीका में अजेय रही ANC पार्टी की हार की वजह देश में बढ़ती गरीबी, अपराध, भ्रष्टाचार और असमानता को माना जा रहा है।

देश की सरकार में DA पार्टी की एंट्री को एक अहम बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। DA लंबे समय से मंडेला की पार्टी की तरफ से अश्वेतों को सशक्त करने के लिए लागू कई नीतियों के विरोध में रही है। उनका कहना है कि इन पॉलिसीज से अश्वेत समुदाय नहीं बल्कि राजनेताओं को फायदा मिलता है। साउथ अफ्रीका के नागरिकों का विकास सुशासन और मजबूत अर्थव्यवस्था से होगा।

अश्वेतों को 1994 में मिला वोटिंग का अधिकार
दक्षिण अफ्रीका में 1994 से पहले अश्वेत लोगों को वोट देने की अनुमति नहीं थी। रंगभेद के आधार पर चल रहे सिस्टम के खिलाफ लोगों ने सालों तक संघर्ष किया था। इसके खत्म होने के बाद देश में पहली बार पूर्ण लोकतांत्रिक चुनाव हुआ था। दक्षिण अफ्रीका में पहली बार 1994 में संसदीय चुनाव हुए थे।

इनमें नेल्सन मंडेला अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे। ANC को 62.5 फीसदी वोट मिले। साल 2004 में ANC को सबसे बड़ी सफलता मिली थी। तब उन्हें 70 फीसदी के करीब मत मिले थे। इसके बाद से पार्टी का वोट प्रतिशत कम होना जारी है।

पिछली बार 2019 में हुए चुनाव में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को सबसे कम 57.50 फीसदी वोट मिले थे। साउथ अफ्रीका में अब तक हुए सभी 6 चुनावों में ANC को जीत मिली।

दक्षिण अफ्रीका में इस बार चुनावी मुद्दे क्या थे
दक्षिण अफ्रीका को अफ्रीका महाद्वीप का सबसे उन्नत देश माना जाता है। इसके बावजूद देश में गरीबी और बेरोजगारी चरम पर पहुंच चुकी है। विश्व बैंक के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में बेरोजगारी दर 32 पहुंच चुकी है। इसे ऐसे समझें कि 100 में से 32 लोगों के पास नौकरी नहीं है। 2024 के पहले क्वाटर में ये 33 को पार कर गई थी।

देश में युवा बेरोजगारी दर भी काफी अधिक है। 15-35 आयु वर्ग के 45.50 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। ये दुनिया में सबसे अधिक है। इसके साथ ही आधे से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। दक्षिण अफ्रीका में दुनिया में सबसे अधिक असमानता दर है। यानी कि यहां पर अमीरी-गरीबी की खाई काफी गहरी है।

CNN की रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में करीब 81 फीसदी अश्वेत रहते हैं जिनमें से अधिकांश बेहद गरीबी में जी रहे हैं। वहीं, 19 फीसदी गोरों के पास अधिक संसाधन हैं। उनके पास नौकरी है और उन्हें अश्वेतों की तुलना में अधिक वेतन मिल रहा है। श्वेत वर्चस्व से आजाद होने के 30 साल के बाद अब अश्वेतों को लग रहा है कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) ने उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए बेहतर काम नहीं किया है।

इसके अलावा देश में लगातार बढ़ती अपराध की घटनाएं और नेताओं के भ्रष्टाचार के मामलों से जनता परेशान है। साथ ही देश में लगतार बिजली कटौती में बढ़ोतरी ने देशवासियों का गुस्सा और बढ़ा दिया है। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में जहां 141 घंटे बिजली कटी थी। साल 2023 में ये बढ़कर 6947 घंटे हो गई।

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