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अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बुधवार को प्रकाशित एक वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि दुनिया में 2030 तक कच्चे तेल का सरप्लस होने की संभावना है। क्योंकि लगातार अक्षय ऊर्जा के संसाधनों की तरफ बढ़ता विश्व कच्चे तेल के नए विकल्प खोज रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार इस दशक के अंत तक वैश्विक मांग 106 मिलियन बैरल प्रति दिन(बीपीडी) तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि कुल वैश्विक आपूर्ति क्षमता 114 मिलियन बीपीडी तक पहुंच सकती है।
यह पूर्वानुमान ऐसे समय में आया है जब कुछ दिन पहले ही कच्चे तेल के उत्पादकों के प्रमुख समूह ओपेक+ द्वारा संकेत दिए गए थे कि वे वैश्विक मांग और आपूर्ति को बराबर रखने के लिए सितम्बर से कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती करना शुरू कर देंगे। दुनियाभर में कच्चे तेल की मांग के कमजोर होने के पूर्वानुमानों की आशंकाओं के चलते ही ओपेक समूह द्वारा इस मुद्दे पर विचार किया गया था।
भारत और चीन पर पड़ेगा प्रभाव
अपनी रिपोर्ट में आईईए ने कहा कि विमानन और पेट्रोकेमिकल क्षेत्रों के साथ-साथ चीन और भारत जैसे तेजी से बढ़ते एशियाई देश अभी भी तेल की मांग को बढ़ाएंगे। 2023 में 102 मिलियन बापीडी थी।
इस रिपोर्ट के अनुसार 2029 तक तेल की मांग अपने चरम पर पहुंच जाएगी उसके बाद इसमें अगले वर्ष यानि की 2030 से ही कमी आनी शुरू हो जाएगी। भारत और चीन में तेल की मांग की वृद्धि मुख्य रूप से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण है। लेकिन पारंपरिक वाहनों के लिए ईंधन दक्षता में वृद्धि के साथ-साथ इलेक्ट्रिक कारों की ओर बदलाव और बिजली उत्पादन के लिए मध्य पूर्वी देशों द्वारा तेल के उपयोग में कमी से 2030 तक कुल मांग में वृद्धि को लगभग दो प्रतिशत तक कम करने में मदद मिलेगी।
इन सबके साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और अमेरिका के अन्य देशों के नेतृत्व में तेल उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती दिख रही है। इसके साथ ही ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव के कारण आर्कटिक सागर और महाद्वीप और अंटार्किटिका में नए तेल के स्त्रोत मिलने की संभावना है। जिसके बाद तेल के उत्पादन में लगातार वृद्धि होने की संभावना है।
आईईए ने कहा ,” ऐसे स्तरों पर अतिरिक्त क्षमता तेल बाजारों के लिए महत्वपूर्ण परिणाम दे सकती है। जिसका असर ओपेक देशों और अमेरिकी तेल उत्पादक कंपनियों पर भी पड़ेगा।
एजेंसी के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने एक बयान में कहा, “जैसे-जैसे महामारी की लहर कमजोर पड़ रही है, स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन आगे बढ़ रहा है और चीन की अर्थव्यवस्था की संरचना बदल रही है, वैश्विक तेल मांग में वृद्धि धीमी हो रही है और 2030 तक अपने चरम पर पहुंचने वाली है।” अपने चरम पर पहुंचने के बाद यह कम होने लगेगी। उन्होंने कहा कि तेल कंपनियां यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि उनकी व्यावसायिक रणनीतियां और योजनाएं होने वाले बदलावों के लिए तैयार हों।
आपको बता दें कि लॉकडाउन के समय कच्चे तेल की कीमतें अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गईं थीं जिसके बाद ओपेक देशों ने उत्पादन में कटौती करके इनकी कीमतों को संभाला था। भारत ने उस दौर में कच्चे तेल को खरीद कर भारत और श्रीलंका में स्थित अपने कच्चे तेल के भंडार को भरा था।


